turning unreasonable anxiety into unlikely ideas

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मैंने कल एक कील खरीदी

आखिर कितना वक़्त गवाता,
उलझन से कब तक मुह फिराता
चुनकर एक हज़ारों में,
मैंने कल एक कील खरीदी


“दो कौड़ी की कील है ये तो”
एक नज़र देख, दोस्त ने बोला
चाचा कितना ही चुन के लाये
एक साल न कपड़े टिक पाए

dussehra

Dussehra


दशेहरा

रावण तो हर साल जलाते
अबके कुछ और जलाओ
दूजे धर्म के लोग जलाओ
नीच जाती के जन जलाओ

जिससे कोई बैर बचा हो
उसको चुनके आग लगाओ
बचे न कोई अलग हमसे
सबको एक सामान बनाओ

फर्क नही कर पाओगे,
तो नीति क्या बनाओगे?
भूस में आग लगाने को
चिंगारी कहाँ से लाओगे?

और जब सारे, एक से होंगे
फिर कैसे उत्पात मचेगा
भेद की आढ़ में सेंध लगे तो
खून खराबा रुक जायेगा?

Hisaab

हिसाब

चलो फिर हिसाब हो ही जाये
मुनासिब तारिख ढूँढ ली जाये

जो कहर हमपे बरपा है, वापस देदो
ज़ुल्म जो धाएं हैं, उनका सौदा होगा

तारीफें अपनी, चुन चुन के लौटादो
जो कोई छूटी, उसपे ब्याज लगेगा

निकाल के फ़ोन से, तस्वीरें दे देंगे,
पर जो लम्हे भूले जाते नही
उनके बदले क्या लीजियेगा?

याद रखिये कि ये लड़ाई बेवजह है
वजह ढूँढने का दोनों को वक़्त नही

कई फितूर तुम्हारे, मेहफूस रखे हैं
शौक से मांग लो, मगर
किसी को देने में हड़बड़ी न करना

कोई और ढूँढना पड़ेगा तुम्हारे लिए
हम सा नही, हम से भी कहीं
एक तारिख उसके लिए भी ढूँढो

Talcum Dove

Talcom Dove

He ran away from school,
Red-faced like the result.
It never was the failure
But weariness of insult.

When he rushed inside,
His mother began to cook.
For a sweet smell in air,
She stepped out to look.

Walking towards his room,
She stopped at the door.
Talcum from her dresser,
Now covered all the floor.

To avoid eye contact,
Through mirror, he looked.
Shocked by powder puff,
Silently waiting, she stood.

“You failed another test!”
“Even dove you couldn’t spell?”
She hoped to see his best,
With anger now she swell.

Invisible under the talcum,
was a paper on the floor
deftly cut into a figure
whose spelling he wasn’t sure

Holding it by two corners,
With fingers small as rhyme
Out came a shape whose edges
Were as crisp as sunshine.

Without a haste he hove,
The cutout of talcum dove.

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