Category Archives: poetry

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मैंने कल एक कील खरीदी

आखिर कितना वक़्त गवाता,
उलझन से कब तक मुह फिराता
चुनकर एक हज़ारों में,
मैंने कल एक कील खरीदी


“दो कौड़ी की कील है ये तो”
एक नज़र देख, दोस्त ने बोला
चाचा कितना ही चुन के लाये
एक साल न कपड़े टिक पाए


देख मिश्रा जी ने राग अलापा
घाटे का रहा सौदा बतलाया
“हमसे एक बार पूछ तो लेते,
भीषण डिस्काउंट दिलवा देते”


घरवाले सुनकर फ़ोन पे बोले,
कीलों से यहाँ भरे हैं झोले
नयी खरीद के क्यूँ ले आये
अचार संग क्यूँ नही मंगवाये


ऑफिस पहुँच कर नाम न लेता
पर रोज़ नया बवाल नही होता
न्यूज़ चैनल उदास थे बैठे
सबने अपने ही टॉपिक छेड़े
कब जाने मेरे मुह से निकली
मैंने कल एक कील खरीदी


फिर कीलों पर जो धागा उध्दा
सारी सिलाई ले कर फिसला
दादा की खरीदी, नानी की प्यारी
जंग विरोधी, शायद सोने से संवारी
सब कीलों का ताना बाना
मिलकर बन गया चर्चा का बहाना


सोचा कुछ कम मशवरे सह लूं
मिश्रा जी वाला मॉडल ले लूं
उनकी तीखीं बातें, नाख़ून फेरें
कांच सी प्लेट से कान पे मेरे


घर पहुंचा तो गौर से देखा,
नोक कील की तनिक थी टेढ़ी,
शुक्र करो ऑनलाइन खरीदी,
झट रिप्लेसमेंट की अर्जी दे दी

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Dussehra


दशेहरा

रावण तो हर साल जलाते
अबके कुछ और जलाओ
दूजे धर्म के लोग जलाओ
नीच जाती के जन जलाओ

जिससे कोई बैर बचा हो
उसको चुनके आग लगाओ
बचे न कोई अलग हमसे
सबको एक सामान बनाओ

फर्क नही कर पाओगे,
तो नीति क्या बनाओगे?
भूस में आग लगाने को
चिंगारी कहाँ से लाओगे?

और जब सारे, एक से होंगे
फिर कैसे उत्पात मचेगा
भेद की आढ़ में सेंध लगे तो
खून खराबा रुक जायेगा?

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Hisaab

हिसाब

चलो फिर हिसाब हो ही जाये
मुनासिब तारिख ढूँढ ली जाये

जो कहर हमपे बरपा है, वापस देदो
ज़ुल्म जो धाएं हैं, उनका सौदा होगा

तारीफें अपनी, चुन चुन के लौटादो
जो कोई छूटी, उसपे ब्याज लगेगा

निकाल के फ़ोन से, तस्वीरें दे देंगे,
पर जो लम्हे भूले जाते नही
उनके बदले क्या लीजियेगा?

याद रखिये कि ये लड़ाई बेवजह है
वजह ढूँढने का दोनों को वक़्त नही

कई फितूर तुम्हारे, मेहफूस रखे हैं
शौक से मांग लो, मगर
किसी को देने में हड़बड़ी न करना

कोई और ढूँढना पड़ेगा तुम्हारे लिए
हम सा नही, हम से भी कहीं
एक तारिख उसके लिए भी ढूँढो

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Lattu


लट्टू


खुद ही फीते बाँधनेे में जुट गया
इतना नाराज़ हो गया माँ से
फिर लट्टू लेकर घूमता रहा
कमरे से निकला
हवा से दरवाज़ा बंद हो गया
लट्टू अन्दर, बाहर डोर हाँथ में थी
बेवकूफी ने जोर लगाया तो टूट गयी


दिन ही खराब था, शायद
सुबह से डोरों से झूझ रहा था
फीते बंधे नही तो जूते में फसा लिए
दौड़ते ही निकल जाते
अब लट्टू टूट गया, बस डोर रह गयी


थोड़ी देर दरवाज़े को ताका
लॉक खोलने की कोशिश करी
फिर भगा लॉन की तरफ
मिटटी के धेले से लट्टू बनाया
नया लट्टू न पहले जैसा दिखता था
न ही घूमता
मगर टूटे तो बनाना आसान था


शाम को माँ से दोस्ती कर ली
फीते बाँधने आ गये
कमरा खुला, लट्टू जुड़ गया

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Sweater

स्वेटर

 

तुम्हारे हाँथ का बुना स्वेटर तो नही

याद दिलाती हुई सर्द हवाएं हैं यहाँ

ठण्ड लगती है हाँथ पाव में

हथेली मल लेता हूँ, पाँव को मनाना पड़ता है

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