खिलौने

खिलौने सोचते हैं दिन भर
उन्हें सजा के रखा क्यों है

दोस्ती धूल से हो गयी पर
बेरंग ये सुबह शाम क्यों हैं

ना इधर उधर कुछ बिखरा है
आईने में हरकत क्यों नहीं

एक सलीके से सब सिमटा है
आँगन से शोर उठता क्यों नहीं