turning unreasonable anxiety into unlikely ideas

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bolt_in_the_grass

मैंने कल एक कील खरीदी

आखिर कितना वक़्त गवाता,
उलझन से कब तक मुह फिराता
चुनकर एक हज़ारों में,
मैंने कल एक कील खरीदी


“दो कौड़ी की कील है ये तो”
एक नज़र देख, दोस्त ने बोला
चाचा कितना ही चुन के लाये
एक साल न कपड़े टिक पाए

Ganges at Varanasi

Masaan

पहाड़ों पे हो या समंदर किनारे, हर शेहर की अलग शक्सीयत होती है| बैंगलोर में ‘लेक’ अनेक हैं, तो कभी कभी ज़िन्दगी भी ठेहेरने लगती है| फुरसत के साथी हैं किताबें और फिल्में| कई दिनों से नाम सुन रहा था तो आखिर कल ‘मसान’ देख ली| इसमें बनारस से दो कहानियों को पिरोया गया है|

dussehra

Dussehra


दशेहरा

रावण तो हर साल जलाते
अबके कुछ और जलाओ
दूजे धर्म के लोग जलाओ
नीच जाती के जन जलाओ

जिससे कोई बैर बचा हो
उसको चुनके आग लगाओ
बचे न कोई अलग हमसे
सबको एक सामान बनाओ

फर्क नही कर पाओगे,
तो नीति क्या बनाओगे?
भूस में आग लगाने को
चिंगारी कहाँ से लाओगे?

और जब सारे, एक से होंगे
फिर कैसे उत्पात मचेगा
भेद की आढ़ में सेंध लगे तो
खून खराबा रुक जायेगा?

Hisaab

हिसाब

चलो फिर हिसाब हो ही जाये
मुनासिब तारिख ढूँढ ली जाये

जो कहर हमपे बरपा है, वापस देदो
ज़ुल्म जो धाएं हैं, उनका सौदा होगा

तारीफें अपनी, चुन चुन के लौटादो
जो कोई छूटी, उसपे ब्याज लगेगा

निकाल के फ़ोन से, तस्वीरें दे देंगे,
पर जो लम्हे भूले जाते नही
उनके बदले क्या लीजियेगा?

याद रखिये कि ये लड़ाई बेवजह है
वजह ढूँढने का दोनों को वक़्त नही

कई फितूर तुम्हारे, मेहफूस रखे हैं
शौक से मांग लो, मगर
किसी को देने में हड़बड़ी न करना

कोई और ढूँढना पड़ेगा तुम्हारे लिए
हम सा नही, हम से भी कहीं
एक तारिख उसके लिए भी ढूँढो

golden labrador

Caesar

Last week, I was sitting with a bunch of old friends. One friend asked about Caesar, my golden Labrador. They always do. It has been several years since it died, yet friends ask. In school, all my friends knew about Caesar. Of late, I find it easy to capture nostalgia mother tongue, Hindi.

मैं जब छोटा था, मेरे पास एक कुत्ता था, सीज़र| कभी कभी लेटे हुए बिस्तर से हाँथ फैलाता हूँ और सोचता हूँ कि सीज़र उठ कर आयेगा| लगता है की जब जगह बदलने के लिए उठेगा तो पकड़ लूँगा| गर्दन सहलाकर बिस्तर पे जगह बना दूंगा तो पाव में आकार लेट जायेगा| अगली झपकी खुलने पर जब धक्के से नीचे उतारने की कोशिश करूँगा तो घुर्रा कर कूद जायेगा| फर्श पे अक्सर उसे सहलाते हुए बैठ जाता था| बात समझेगा ऐसे बोलता रहता था|
आज भी दोपहर को कभी घर पे हुआ तो, वरांडे के चक्कर काटता हूँ| किसी कोने में बालों का गुच्छा हो सकता है| बड़े ही धींट थे उसके बाल, कपड़ों से छूटते ही नही थे| जिस दिन घर लाये थे, वो सोता ही रहा| आखिरी बार जो देखा था उसको, सोने की सी हालत थी| उधर लॉन की दीवार के पास जिस दिन दफनाया गया उसे, इधर दराज़ से एक पुरानी फोटो ढून्ढ कर डाईरी में रख ली थी|
रोज़ डाईरी खोलने की नौबत नही आती| रोज़ नींद भी नही आती| अकेले रहने में डर नही लगता| सन्नाटे में पंखे के अलावा उसकी हवा से उड़ते पर्दों या कागज़ की आवाज़ होती है| हर पल कुछ बदल रहा होता है मगर इतने धीरे की आहाट तो दूर अंदाजा भी नही लगता| ऐसे में कई लोगों को झुंझलाते हुए देखा है| उनको एक पल भी ठेहेरना चुभता है| मुझे भीड़ में उलझन लगती है, शोर सेहन नही होता और लोग समझ कम आते|

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