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शर्त

हाल-ए-दिल तो हम सुना दें,
बशर्ते कोई ऐतबार तो करे

फलक पे हम सज़ा लें तउम्र 
बशर्ते कोई प्यार तो करे

फ़िक्र करने वाले बेशुमार मिले
मुश्किल है मिलना, जो प्यार करे 

मकान

एक मकान ख़रीदा है
बड़ी खिड़कियों वाला
धुप से नाहाता है
शाम होते ही गुनगुनाता है
चौखट पे तुम्हारे लगाए
छोटे छोटे आईने रंगने बचे हैं

नकल

नकल करते हैं खुशी की
पर उदासी छिप नहीं पाती
स्लेट के चेहरे पे बनी
चाक से हंसी टिक नहीं पाती

बहुत हो गया बचपना
बड़ों की तरह बन जाओ
हर सवाल का सच्चा जवाब
देने की जरूरत होती नहीं

शिकायतें इकट्ठा करने
की आदत छोड़ दो
भिगो दो हसरतें लिख कर
गीले कागज उड़ते नहीं

हम जो बदलते रहे उनके इशारों पे 
उनकी शिकायत रही, इतना बदलते क्यूँ हैं
क्या मिला ज़माने से लड़ के हमें,
ख़ुद से लड़ते हुए बस ज़माने गए
न कभी जिक्र हवाओं से मेरा कर बैठना तुम
चुगलखोर उगल देंगी, तुमपे कितना मरते हैं हम

नियत

राख के सनन्दर हैं
जिन्हें आँसुयों से सींच रहे हो

नियत नहीं माज़ी है इसे
बदलने में क्यूँ लगे हो

एक साल

एक साल में सौ खो गये 
सवा सौ करोड़ की भीड़ से

तुम फ़ैज़ की बातें करते हो
इन्हें मौत से फ़र्क़ नहीं पड़ता

जहां जान बचाने आए थे
वहीं जान से हाथ धो बैठे 

हसरत

सभी उस हाल से हैरान हैं
के जसमे हाथ है हर एक का
ना कोई शाख़ बची महफूस
सभी को छांव की हसरत है

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